श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १२४

श्रीराम-स्तुति · पद १२४ / २७९

जौ निज मन परिहरै बिकारा।

तौ कत द्वैत-जनित संसृति-दुख,संसय,सोक अपारा ॥ १ ॥

सत्रु,मित्र,मध्यस्थ,तीनि ये, मन कीन्हे बरिआई।

त्यागन,गहन,उपेच्छनीय,अहि हाटक तृनकी नाई ॥ २ ॥

असन,बसन,पसु बस्तु बिबिध बिधिसब मनि महँ रह जैसे।

सरग,नरक,चर-अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे ॥ ३ ॥

बिटप-मध्य पुतरिका,सूत महँ कंचुकि बिनहिं बनाये।

मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये ॥ ४ ॥

रघुपति-भगति-बारि-छालित-चित, बिनु प्रयास ही सूझै।

तुलसिदास कह चिद-बिलास जग बूझत बूझत बूझै ॥ ५ ॥