पद 126
श्रीराम-स्तुति · पद 126 / 279
मन मेरे,मानहि सिख मेरी। जो निजु भगति चहै हरि केरी ॥ 1 ॥
उर आनहि प्रभु-कृत हित जेते। सेवहि ते जे अपनपौ चेते ॥ 2 ॥
दुख-सुख अरु अपमान-बड़ाई। सब सम लेखहि बिपति बिहाई ॥ 3 ॥
सुनु सठ काल-ग्रसित यह देही। जनि तेहि लागि बिदूषहि केही ॥ 4 ॥
तुलसिदास बिनु असि मति आयै। मिलहिं न राम कपट-लौ लाये ॥ 5 ॥