श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 127

मै जानी,हरिपद-रति नाहीं। सपनेहुँ नहिं बिराग मन माहीं ॥ 1 ॥

जे रघुबीर चरन अनुरागे। तिन्ह सब भोग रोगसम त्यागे ॥ 2 ॥

काम-भुजंग डसत जब जाहीं। बिषय-नींब कटु लगत न ताही ॥ 3 ॥

असमंजस अस हृदय बिचारी। बढ़त सोच नित नूतन भारी ॥ 4 ॥

जब कब राम-कृपा दुख जाई। तुलसिदास नहिं आन उपाई ॥ 5 ॥