पद 127
श्रीराम-स्तुति · पद 127 / 279
मै जानी,हरिपद-रति नाहीं। सपनेहुँ नहिं बिराग मन माहीं ॥ 1 ॥
जे रघुबीर चरन अनुरागे। तिन्ह सब भोग रोगसम त्यागे ॥ 2 ॥
काम-भुजंग डसत जब जाहीं। बिषय-नींब कटु लगत न ताही ॥ 3 ॥
असमंजस अस हृदय बिचारी। बढ़त सोच नित नूतन भारी ॥ 4 ॥
जब कब राम-कृपा दुख जाई। तुलसिदास नहिं आन उपाई ॥ 5 ॥