श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १२९

श्रीराम-स्तुति · पद १२९ / २७९

रुचिर रसना तू राम राम राम क्यों न रटत।

सुमिरत सुख-सुकृत बढ़त, अघ-अमंगल घटत ॥ १ ॥

बिनु श्रम कलि-कलुषजाल कटु कराल कटत।

दिनकरके उदय जैसे तिमिर-तोम फटत ॥ २ ॥

जोग,जाग,जप,बिराग,तप सुतीरथ-अटत।

बाँधिबेको भव-गयंद रेनुकी रजु बटत ॥ ३ ॥

परिहरि सुर-मनि सुनाम, गुंजा लखि लटत।

लालच लघु तेरो लखि, तुलसि तोहि हटत ॥ ४ ॥