पद १३०
श्रीराम-स्तुति · पद १३० / २७९
राम राम,राम राम,राम राम, जपत।
मंगल-मुद उदित होत, कलि-मल-छल छपत ॥ १ ॥
कहु के लहे फल रसाल, बबुर बीज बपत।
हाहरि जनि जनम जाय गाल गूल गपत ॥ २ ॥
काल,करम,गुन,सुभाउ सबके सीस तपत।
राम-नाम-महिमाकी चरचा चले चपत ॥ ३ ॥
साधन बिनु सिद्धि सकल बिकल लोग लपत।
कलिजुग बर बनिज बिपुल, नाम-नगर खपत ॥ ४ ॥
नाम सों प्रतीति-प्रीति हृदय सुथिर थपत।
पावन किये रावन-रिपु तुलसिहु-से अपत ॥ ५ ॥