श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 132

राम-से प्रीतमकी प्रीति-रहित जीव जाय जियत।

जेहि सुख सुख मानि लेत, सुख सो समुझ कियत ॥ 1 ॥

जहँ जहँ जेहि जोनि जनम महि, पताल,बियत।

तहँ-तहँ तू बिषय-सुखहिं, चहत लहत नियत ॥ 2 ॥

कत बिमोह लट्यो,फट्यो गगन मगन सियत।

तुलसी प्रभु-सुजस गाइ, क्यों न सुधा पियत ॥ 3 ॥