श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 133

तोसो हौं फिरि फिरि हित,प्रिय, पुनीत सत्य बचन कहत।

सुनि मन,गुनि,समुझि, क्यों न सुगम सुमग गहत ॥ 1 ॥

छोटो बड़ो,खोटो खरो, जग जो जहँ रहत।

अपनो अपनेको भलो कहहु, को न चहत ॥ 2 ॥

बिधि लगि लघु कीट अवधि सुख सुखी, दुख दहत।

पसु लौं पसुपाल ईस बाँधत छोरत नहत ॥ 3 ॥

बिषय मुद निहार भार सिर काँधे ज्यों बहत।

योहीं जिय जानि,मानि सठ! तू साँसति सहत ॥ 4 ॥

पायो केहि घृत बिचारु, हरिन-बारि महत।

तुलसी तकु ताहि सरन, जाते सब लहत ॥ 5 ॥