पद १३३
श्रीराम-स्तुति · पद १३३ / २७९
तोसो हौं फिरि फिरि हित,प्रिय, पुनीत सत्य बचन कहत।
सुनि मन,गुनि,समुझि, क्यों न सुगम सुमग गहत ॥ १ ॥
छोटो बड़ो,खोटो खरो, जग जो जहँ रहत।
अपनो अपनेको भलो कहहु, को न चहत ॥ २ ॥
बिधि लगि लघु कीट अवधि सुख सुखी, दुख दहत।
पसु लौं पसुपाल ईस बाँधत छोरत नहत ॥ ३ ॥
बिषय मुद निहार भार सिर काँधे ज्यों बहत।
योहीं जिय जानि,मानि सठ! तू साँसति सहत ॥ ४ ॥
पायो केहि घृत बिचारु, हरिन-बारि महत।
तुलसी तकु ताहि सरन, जाते सब लहत ॥ ५ ॥