श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १३४

श्रीराम-स्तुति · पद १३४ / २७९

ताते हौं बार बार देव! द्वार परि पुकार करत।

आरति,नति,दीनता कहें प्रभु संकट हरत ॥ १ ॥

लोकपाल सोक-बिकल रावन-डर डरत।

का सुनि सकुचे कृपालु नर-सरीर धरत ॥ २ ॥

कौसिक,मुनि-तीय, जनक सोच-अनल जरत।

साधन केहि सीतल भये, सो न समुझि परत ॥ ३ ॥

केवट,खग,सबरि सहज चरनकमल न रत।

सनमुख तोहिं होत नाथ! कुतरुíसुफरु फरत ॥ ४ ॥

बंधु-बैर कपि-बिभीषन गुरु गलानि गरत।

सेवा केहि रीझि राम, किये सरिस भरत ॥ ५ ॥

सेवक भयो पवनपूत साहिब अनुहरत।

ताको लिये नाम राम सबको सुढर ढरत ॥ ६ ॥

जाने बिनु राम-रीति पचि पचि जग मरत।

परिहरि छल सरन गये तुलसिहु-से तरत ॥ ७ ॥