श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १४०

श्रीराम-स्तुति · पद १४० / २७९

ते नर नरकरूप जीवत जग भव-भंजन-पद-बिमुख अभागी।

निसिबासर रुचिपाप असुचिमन,खलमति-मलिन,निगमापथ-त्यागी ॥ १ ॥

नहिं सतसंग भजन नहिं हरिको,स्त्रवन न राम-कथा-अनुरागी।

सुत-बित-दार-भवन-ममता-निसि सोवत अति, न कबहुँ मति जागी ॥ २ ॥

तुलसिदास हरिनाम-सुधा तजि, सठ हठि पियत बिषय-बिष माँगी।

सूकर-स्वान-सृगाल,सरिस जन, जनमत जगत जननि-दुख लागी ॥ ३ ॥