श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १४१

श्रीराम-स्तुति · पद १४१ / २७९

रामचंद्र! रघुनायक तुमसों हौं बिनती केहि भाँति करौं।

अघ अनेक अवलोकि आपने, अनघ नाम अनुमानि डरौं ॥ १ ॥

पर-दुख दुखी सुखी पर-सुख ते, संत-सील नहिं हृदय धरौं।

देखि आनकी बिपति परम सुख, सुनि संपति बिनु आगि जरौं ॥ २ ॥

भगति-बिराग-ग्यान साधन कहि बहु बिधि डहकत लोग फिरों।

सिव-सरबस सुखधाम नाम तव, बेचि नरकप्रद उदर भरौं ॥ ३ ॥

जानत हौं निज पाप जलधि जिय, जल-सीकर सम सुनत लरौं।

रज-सम-पर अवगुन सुमेरु करि, गुन गिरि-सम रजतें निदरौं ॥ ४ ॥

नाना बेष बनाय दिवस-निसि, पर-बित जेहि तेहि जुगुति हरौं।

एकौ पल न कबहुँ अलोल चित हित दै पद-सरोज सुमिरौं ॥ ५ ॥

जो आचरन बिचारहु मेरो,कलप कोटि लगि औटि मरौं।

तुलसिदास प्रभु कृपा-बिलोकनि,गोपद-ज्यों भवसिंधु तरौं ॥ ६ ॥