श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १४२

श्रीराम-स्तुति · पद १४२ / २७९

सकुचत हौं अति राम कृपानिधि! क्यों करि बिनय सुनावौं।

सकल धरम बिपरीत करत,केहि भाँति नाथ! मन भावौ ॥ १ ॥

जानत हौं हरि रूप चराचर, मैं हठि नयन न लावौं।

अंजन-केस-सिखा जुवती, तहँ लोचन-सलभ पठावौं ॥ २ ॥

स्त्रवननिको फल कथा तुम्हारी, यह समुझौं,समुझावौं।

तिन्ह स्त्रवननि परदोष निरंतर सुनि सुनि भरि भरि तावौं ॥ ३ ॥

जेहि रसना गुन गाइ तिहारे, बिनु प्रयास सुख पावौं।

तेहि मुख पर-अपवाद भेक ज्यों रटि-रटि जनम नसावौं ॥ ४ ॥

’करहु हृदय अति बिमल बसहिं हरि’, कहि कहि सबहिं सिखावौं।

हौं निज उर अभिमान-मोह-मद खल-मंडली बसावौं ॥ ५ ॥

जो तनु धरि हरिपद साधहिं जन, सो बिनु काज गँवावौं।

हाटक-घट भरि धर्यो सुधा गृह, तजि नभ कूप खनावौं ॥ ६ ॥

मन-क्रम-बचन लाइ कीन्हे अघ, ते करि जतन दुरावौं।

पर-प्रेरित इरषा बस कबहुँक किय कछु सुभ,सो जनावौं ॥ ७ ॥

बिप्र-द्रोह जनु बाँट पर्यो, हठि सबसों बैर बढ़ावौ।

ताहूपर निज मति-बिलास सब संतन माँझ गनावौं ॥ ८ ॥

निगम सेस सारद निहोरि जो अपने दोष कहावौं।

तौ न सिराहिं कलप सत लगि प्रभु, कहा एक मुख गावौं ॥ ९ ॥

जो करनी आपनी बिचारौं, तौं कि सरन हौं आवौं।

मृदुल सुभाउ सील रघुपतिको, सो बल मनहिं दिखावौं ॥ १० ॥

तुलसिदास प्रभु सो गुन नहिं, जेहि सपनेहुँ तुमहिं रिझावौं।

नाथ-कृपा भवसिंधु धेनुपद सम जो जानि सिरावौं ॥ ११ ॥