श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १४३

श्रीराम-स्तुति · पद १४३ / २७९

सुनहु राम रघुबीर गुसाई, मन अनीति-रत मेरो।

चरन-सरोज बिसारि तिहारे, निसिदिन फिरत अनेरो ॥ १ ॥

मानत नाहिं निगम-अनुसासन, त्रास न काहू केरो।

भूल्यो सूल करम-कोलुन्ह तिल ज्यों बहु बारनि पेरो ॥ २ ॥

जहँ सतसंग कथा माधवकी, सपनेहुँ करत न फेरो।

लोभ-मोह-मद-काम-कोह-रत, तिन्हसों प्रेम घनेरो ॥ ३ ॥

पर-गुन सुनत दाह, पर-दूषन सुनत हरख बहुतेरो।

आप पापको नगर बसावत, सहि न सकत पर खेरो ॥ ४ ॥

साधन-फल,श्रुति-सार नाम तव, भव-सरिता कहँ बेरो।

सो पर-कर काँकिनी लागि सठ, बेंचि होत हठि चेरो ॥ ५ ॥

कबहुँक हौं संगति-प्रभावतें,जाँउ सुमारग नेरो।

तब करि क्रोध संग कुमनोरथ देत कठिन भटभेरो ॥ ६ ॥

इक हौं दीन,मलीन,हीनमति,बिपतिजाल अति घेरो।

तापर सहि न जाय करुनानिधि, मनको दुसह दरेरो ॥ ७ ॥

हारि पर्यो करि जतन बहुत बिधि, तातें कहत सबेरो।

तुलसिदास यह त्रास मिटै जब हृदय करहु तुम डेरो ॥ ८ ॥