श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 143

सुनहु राम रघुबीर गुसाई, मन अनीति-रत मेरो।

चरन-सरोज बिसारि तिहारे, निसिदिन फिरत अनेरो ॥ 1 ॥

मानत नाहिं निगम-अनुसासन, त्रास न काहू केरो।

भूल्यो सूल करम-कोलुन्ह तिल ज्यों बहु बारनि पेरो ॥ 2 ॥

जहँ सतसंग कथा माधवकी, सपनेहुँ करत न फेरो।

लोभ-मोह-मद-काम-कोह-रत, तिन्हसों प्रेम घनेरो ॥ 3 ॥

पर-गुन सुनत दाह, पर-दूषन सुनत हरख बहुतेरो।

आप पापको नगर बसावत, सहि न सकत पर खेरो ॥ 4 ॥

साधन-फल,श्रुति-सार नाम तव, भव-सरिता कहँ बेरो।

सो पर-कर काँकिनी लागि सठ, बेंचि होत हठि चेरो ॥ 5 ॥

कबहुँक हौं संगति-प्रभावतें,जाँउ सुमारग नेरो।

तब करि क्रोध संग कुमनोरथ देत कठिन भटभेरो ॥ 6 ॥

इक हौं दीन,मलीन,हीनमति,बिपतिजाल अति घेरो।

तापर सहि न जाय करुनानिधि, मनको दुसह दरेरो ॥ 7 ॥

हारि पर्यो करि जतन बहुत बिधि, तातें कहत सबेरो।

तुलसिदास यह त्रास मिटै जब हृदय करहु तुम डेरो ॥ 8 ॥