पद १४४
श्रीराम-स्तुति · पद १४४ / २७९
सो धौ को जो नाम-लाज ते, नहिं राख्यो रघुबीर।
कारुनीक बिनु कारन ही हरि हरी सकल भव-भीर ॥ १ ॥
बेद-बिदित,जग-बिदित अजामिल बिप्रबंधु अघ-धाम।
घोर जमालय जात निवार्यो सुत-हित सुमिरत नाम ॥ २ ॥
पसु पामर अभिमान-सिंधु गज ग्रस्यो आइ जब ग्राह।
सुमिरत सकृत सपदि आये प्रभु, हर्यो दुसह उर दाह ॥ ३ ॥
ब्याध,निषाद,गीध,गनिकादिक, अगनित औगुन-मूल।
नाम-औटतें राम सबनिकी दूरि करी सब सूल ॥ ४ ॥
केहि आचरन घाटि हौं तिनतें, रघुकुल-भूषन भूप।
सीदत तुलसिदास निसिबासर पर्यो भीम तम-कूप ॥ ५ ॥