श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 144

सो धौ को जो नाम-लाज ते, नहिं राख्यो रघुबीर।

कारुनीक बिनु कारन ही हरि हरी सकल भव-भीर ॥ 1 ॥

बेद-बिदित,जग-बिदित अजामिल बिप्रबंधु अघ-धाम।

घोर जमालय जात निवार्यो सुत-हित सुमिरत नाम ॥ 2 ॥

पसु पामर अभिमान-सिंधु गज ग्रस्यो आइ जब ग्राह।

सुमिरत सकृत सपदि आये प्रभु, हर्यो दुसह उर दाह ॥ 3 ॥

ब्याध,निषाद,गीध,गनिकादिक, अगनित औगुन-मूल।

नाम-औटतें राम सबनिकी दूरि करी सब सूल ॥ 4 ॥

केहि आचरन घाटि हौं तिनतें, रघुकुल-भूषन भूप।

सीदत तुलसिदास निसिबासर पर्यो भीम तम-कूप ॥ 5 ॥