पद १४५
श्रीराम-स्तुति · पद १४५ / २७९
कृपासिंधु! जन दीन दुवारे दादि न पावत काहे।
जब जहँ तुमहिं पुकारत आरत, तहँ तिन्हके दुख दाहे ॥ १ ॥
गज,प्रहलाद,पांडुसुत,कपि सबको रिपु-संकट मेट्यो।
प्रनत,बंधु-भय-बिकल,बिभीषन,उठि सो भरत ज्यों भेट्यो ॥ २ ॥
मैं तुम्हरो लेइ नाम ग्राम इक उर आपने बसावों।
भजन,बिबेक,बिराग,लोग भले, मैं क्रम-क्रम करि ल्यावों ॥ ३ ॥
सुनि रिस भरे कुटिल कामादिक, करहिं जोर बरिआई।
तिन्हहिं उजारि नारि-अरि-धन पुर राखहिं राम गुसाईं ॥ ४ ॥
सम-सेवा-छल-दान-दंड हौं, रचि उपाय पचि हार्यो।
बिनु कारनको कलह बड़ो दुख, प्रभुसों प्रगटि पुकार्यो ॥ ५ ॥
सुर स्वारथी,अनीस,अलायक,निठुर,दया चित नाहीं।
जाउँ कहाँ, को बिपति-निवारक, भवतारक जग माही ॥ ६ ॥
तुलसी जदपि पोच,तउ तुम्हरो, और न काहु केरो।
दीजै भगति-बाँह बारक, ज्यों सुबस बसै अब खेरो ॥ ७ ॥