श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 147

कृपासिंधु ताते रहौं निसिदिन मन मारे।

महाराज! लाज आपुही निज जाँघ उघारे ॥ 1 ॥

मिले रहैं , मार्यौ चहै कामादि संघाती।

मो बिनु रहै न, मेरियै जारैं छल छाती ॥ 2 ॥

बसत हिये हित जानि मैं सबकी रुचि पाली।

कियो कथकको दंड हौं जड़ करम कुचाली ॥ 3 ॥

देखी सुनी न आजु लौं अपनायति ऐसी।

करहिं सबै सिर मेरे ही फिरि परै अनैसी ॥ 4 ॥

बड़े अलेखी लखि परै, परिहरै न जाहीं।

असमंजसमें मगन हौं, लीजै गहि बाहीं ॥ 5 ॥

बारक बलि अवलोकिये, कौतुक जन जी को।

अनायास मिटि जाइगो संकट तुलसीको ॥ 6 ॥