पद 147
श्रीराम-स्तुति · पद 147 / 279
कृपासिंधु ताते रहौं निसिदिन मन मारे।
महाराज! लाज आपुही निज जाँघ उघारे ॥ 1 ॥
मिले रहैं , मार्यौ चहै कामादि संघाती।
मो बिनु रहै न, मेरियै जारैं छल छाती ॥ 2 ॥
बसत हिये हित जानि मैं सबकी रुचि पाली।
कियो कथकको दंड हौं जड़ करम कुचाली ॥ 3 ॥
देखी सुनी न आजु लौं अपनायति ऐसी।
करहिं सबै सिर मेरे ही फिरि परै अनैसी ॥ 4 ॥
बड़े अलेखी लखि परै, परिहरै न जाहीं।
असमंजसमें मगन हौं, लीजै गहि बाहीं ॥ 5 ॥
बारक बलि अवलोकिये, कौतुक जन जी को।
अनायास मिटि जाइगो संकट तुलसीको ॥ 6 ॥