पद १४८
श्रीराम-स्तुति · पद १४८ / २७९
कहौ कौन मुहँ लाइ कै रघुबीर गुसाई।
सकुचत समुझत आपनी सब साइँ दुहाई ॥ १ ॥
सेवत बस,सुमिरत सखा, सरनागत सो हौं।
गुनगन सीतानाथके चित करत न हौं हौं ॥ २ ॥
कृपासिंधु बंधु दीनके आरत-हितकारी।
प्रनत-पाल बिरुदावली सुनि जानि बिसारी ॥ ३ ॥
सेइ न धेइ न सुमिरि कै पद-प्रीति सुधारी।
पाइ सुसाहिब राम सों, भरि पेट बिगारी ॥ ४ ॥
नाथ गरीबनिवाज हैं ,मैं गही न गरीबी।
तुलसी प्रभु निज ओर तें बनि परै सो कीबी ॥ ५ ॥