श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 148

कहौ कौन मुहँ लाइ कै रघुबीर गुसाई।

सकुचत समुझत आपनी सब साइँ दुहाई ॥ 1 ॥

सेवत बस,सुमिरत सखा, सरनागत सो हौं।

गुनगन सीतानाथके चित करत न हौं हौं ॥ 2 ॥

कृपासिंधु बंधु दीनके आरत-हितकारी।

प्रनत-पाल बिरुदावली सुनि जानि बिसारी ॥ 3 ॥

सेइ न धेइ न सुमिरि कै पद-प्रीति सुधारी।

पाइ सुसाहिब राम सों, भरि पेट बिगारी ॥ 4 ॥

नाथ गरीबनिवाज हैं ,मैं गही न गरीबी।

तुलसी प्रभु निज ओर तें बनि परै सो कीबी ॥ 5 ॥