पद १४९
श्रीराम-स्तुति · पद १४९ / २७९
कहाँ जाउँ, कासों कहौं, और ठौर न मेरे।
जनम गँवायो तेरे ही द्वार किंकर तेरे ॥ १ ॥
मै तौ बिगारी नाथ सों आरतिके लीन्हें।
तोहि कृपानिधि क्यों बनै मेरी-सी कीन्हें ॥ २ ॥
दिन-दुरदिन दिन-दुरदसा, दिन-दुख दिन-दूषन।
जब लौं तू न बिलोकिहै रघुबंस-बिभूषन ॥ ३ ॥
दई पीठ बिनु डीठ मैं तुम बिस्व बिलोचन।
तो सों तुही न दूसरो नत-सोच-बिमोचन ॥ ४ ॥
पराधीन देव दीन हौं,स्वाधीन गुसाईं।
बोलनिहारे सों करै बलि बिनयकी झाई ॥ ५ ॥
आपु देखि मोहि देखिये जन मानिय साँचो।
बड़ी ओट रामनामकी जेहि लई सो बाँचो ॥ ६ ॥
रहनि रीति राम रावरी नित हिय हुलसी है।
ज्यों भावै त्यों करु कृपा तेरो तुलसी है ॥ ७ ॥