श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 149

कहाँ जाउँ, कासों कहौं, और ठौर न मेरे।

जनम गँवायो तेरे ही द्वार किंकर तेरे ॥ 1 ॥

मै तौ बिगारी नाथ सों आरतिके लीन्हें।

तोहि कृपानिधि क्यों बनै मेरी-सी कीन्हें ॥ 2 ॥

दिन-दुरदिन दिन-दुरदसा, दिन-दुख दिन-दूषन।

जब लौं तू न बिलोकिहै रघुबंस-बिभूषन ॥ 3 ॥

दई पीठ बिनु डीठ मैं तुम बिस्व बिलोचन।

तो सों तुही न दूसरो नत-सोच-बिमोचन ॥ 4 ॥

पराधीन देव दीन हौं,स्वाधीन गुसाईं।

बोलनिहारे सों करै बलि बिनयकी झाई ॥ 5 ॥

आपु देखि मोहि देखिये जन मानिय साँचो।

बड़ी ओट रामनामकी जेहि लई सो बाँचो ॥ 6 ॥

रहनि रीति राम रावरी नित हिय हुलसी है।

ज्यों भावै त्यों करु कृपा तेरो तुलसी है ॥ 7 ॥