श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 150

रामभद्र! मोहिं आपनो सोच है अरु नाहीं।

जीव सकल संतापके भाजन जग माहीं ॥ 1 ॥

नातो बड़े समर्थ सों इक ओर किधौं हूँ।

तोको मोसे अति घने मोको एकै तूँ ॥ 2 ॥

बड़ी गलानि हिय हानि है सरबग्य गुसाईं।

कूर कुसेवक कहत हौं सेवककी नाई ॥ 3 ॥

भलो पोच रामको कहैं मोहि सब नरनारी।

बिगरे सेवक स्वान ज्यों साहिब-सिर गारी ॥ 4 ॥

असमंजस मनको मिटै सो उपाय न सूझै।

दीनबंधु! कीजै सोई बनि परै जो बूझै ॥ 5 ॥

बिरुदावली बिलोकिये तिन्हमें कोउ हौं हौं।

तुलसी प्रभुको परिहर्यो सरनागत सो हौं ॥ 6 ॥