श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 151

जो पै चेराई रामकी करतो न लजातो।

तौ तू दाम कुदाम ज्यों कर-कर न बिकातो ॥ 1 ॥

जपत जीह रघुनाथको नाम नहिं अलसातो।

बाजीगरके सूम ज्यों खल खेह न खातो ॥ 2 ॥

जौ तू मन! मेरे कहे राम-नाम कमातो।

सीतापति सनमुख सुखी सब ठाँव समातो ॥ 3 ॥

राम सोहाते तोहिं जौ तू सबहिं सोहातो।

काल करम कुल कारनी कोऊ न कोहातो ॥ 4 ॥

राम-नाम अनुरागही जिय जो रतिआतो।

स्वारथ-परमारथ-पथी तोहिं सब पतिआतो ॥ 5 ॥

सेइ साधु सुनि समुझि कै पर-पीर पिरातो।

जनम कोटिको काँदले हृद-हृदय थिरातो ॥ 6 ॥

भव-मग अगम अनंत है, बिनु श्रमहि सिरातो।

महिमा उलटे नामकी मुनि कियो किरातो ॥ 7 ॥

अमर-अगम तनु पाइ सो जड़ जाय न जातो।

होतो मंगल-मूल तू, अनुकूल बिधातो ॥ 8 ॥

जो मन-प्रीति-प्रतीतिसों राम-नामहिं रातो।

नसातो

तुलसी रामप्रसादसों तिहुँताप ——- ॥ 9 ॥

नसातो