श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 152

राम भलाई आपनी भल कियो न काको।

जुग जुग जानकीनाथको जग जागत साको ॥ 1 ॥

ब्रह्मादिक बिनती करी कहि दुख बसुधाको।

रबिकुल-कैरव-चंद भो आनंद-सुधाको ॥ 2 ॥

कौसिक गरत तुषार ज्यों तकि तेज तियाको।

प्रभु अनहित हित को दियो फल कोप कृपाको ॥ 3 ॥

हर्यो पाप आप जाइकै संताप सिलाको।

सोच-मगन काढ्यो सही साहिब मिथिलाको ॥ 4 ॥

रोष-रासि भृगुपति धनी अहमिति ममताको।

चितवत भाजन करि लियो उपसम समताको ॥ 5 ॥

मुदित मानि आयसु चले बन मातु-पिताको।

धरम-धुरंधर धीरधुर गुन-सील-जिता को ? ॥ 6 ॥

गुह गरीब गतग्याति हू जेहि जिउ न भखा को ?

पायो पावन प्रेम ते सनमान सखाको ॥ 7 ॥

सदगति सबरी गीधकी सादर करता को ?

सोच-सींव सुग्रीवके संकट-हरता को ? ॥ 8 ॥

अस काल-गहा

राखि बिभीषनको सकै ———– को ?

तेहि काल कहाँ

आज बिराजत राज है दसकंठ जहाँको ॥ 9 ॥

बालिस बासी अवधको बूझिये न खाको।

सो पाँवर पहुँचो तहाँ जहँ मुनि-मन थाको ॥ 10 ॥

गति न लहै राम-नामसों बिधि सो सिरिजा को ?

सुमिरत कहत प्रचारि कै बल्लभ गिरिजाको ॥ 11 ॥

अकनि अजामिलकी कथा सानंद न भा को ?

नाम लेत कलिकालहू हरिपुरहिं न गा को ? ॥ 12 ॥

राम-नाम-महिमा करै काम-भुरुह आको।

साखी बेद पुरान है तुलसी-तन ताको ॥ 13 ॥