श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 153

मेरे रावरियै गति है रघुपति बलि जाउँ ।

निलज नीच निरधन निरगुन कहँ, जग दूसरो न ठाकुर ठाउँ ॥ 1 ॥

है घर-घर बहु भरे सुसाहिब, सूझत सबनि आपनो दाउँ ।

बानर-बंधु बिभीषन-हितु बिनु, कोसलपाल कहूँ न समाउँ ॥ 2 ॥

प्रनतारति- भंजन जन-रंजन, सरनागत पबि-पंजर नाउँ ।

कीजै दास दासतुलसी अब, कृपासिंधु बिनु मोल बिकाउँ ॥ 3 ॥