पद 154
श्रीराम-स्तुति · पद 154 / 279
देव ! दूसरो कौन दीनको दयालु ।
सीलनिधान सुजान-सिरोमनि, सरनागत-प्रिय प्रनत-पालु ॥ 1 ॥
को समरथ सरबग्य सकल प्रभु, सिव-सनेह-मानस मरालु ।
को साहिब किये मीत प्रीतिबस खग निसिचर कपि भील भालु ॥ 2 ॥
नाथ हाथ माया-प्रपंच सब,जीव-दोष-गुन-करम-कालु ।
तुलसिदास भलो पोच रावरो, नेकु निरखि कीजिये निहालु ॥ 3 ॥