श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 154

देव ! दूसरो कौन दीनको दयालु ।

सीलनिधान सुजान-सिरोमनि, सरनागत-प्रिय प्रनत-पालु ॥ 1 ॥

को समरथ सरबग्य सकल प्रभु, सिव-सनेह-मानस मरालु ।

को साहिब किये मीत प्रीतिबस खग निसिचर कपि भील भालु ॥ 2 ॥

नाथ हाथ माया-प्रपंच सब,जीव-दोष-गुन-करम-कालु ।

तुलसिदास भलो पोच रावरो, नेकु निरखि कीजिये निहालु ॥ 3 ॥