श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 157

सेइये सुसाहिब राम सो ।

सुखद सुसील सुजान सूर सुचि, सुंदर कोटिक काम सो ॥ 1 ॥

सारद सेस साधु महिमा कहैं , गुनगन-गायक साम सो ।

सुमिरि सप्रेम नाम जासों रति चाहत चंद्र-ललाम सो ॥ 2 ॥

गमन बिदेस न लेस कलेसको,सकुचत सकृत प्रनाम सो ।

साखी ताको बिदित बिभीषन, बैठो है अबिचल धाम सो ॥ 3 ॥

टहल सहल जन महल-महल,जागत चारो जुग जाम सो ।

देखत दोष न रीझत ,रीझत सुनि सेवक गुन-ग्राम सो ॥ 4 ॥

जाके भजे तिलोक-तिलक भये,त्रिजग जोनि तनु तामसो ।

तुलसी ऐसे प्रभुहिं भजै जो न ताहि बिधाता बाम सो ॥ 5 ॥