श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १५८

श्रीराम-स्तुति · राग नट · पद १५८ / २७९

कैसे देउँ नाथहिं खोरि ।

काम-लोलुप भ्रमत मन हरि भगति परिहरि तोरि ॥ १ ॥

बहुत प्रीति पुजाइबे पर, पूजिबे पर थोरि।

देत सिख सिखयो न मानत,मूढ़ता असि मोरि ॥ २ ॥

किये सहित सनेह जे अघ हृदय राखे चोरि ।

संग-बस किये सुभ सुनाये सकल लोक निहोरि ॥ ३ ॥

करौं जो कछु धरौं सचि-पचि सुकृत-सिला बटोरि ।

पैठि उर बरबस दयानिधि दंभ लेत अँजोरि ॥ ४ ॥

लोभ मनहिं नचाव कपि ज्यों, गरे आसा-डोरि ।

बात कहौं बनाइ बुध ज्यों, बर बिराग निचोरि ॥ ५ ॥

एतेहुँ पर तुम्हरो कहावत,लाज अँचई घोरि ।

निलजता पर रीझि रघुबर, देहु तुलसिहिं छोरि ॥ ६ ॥