श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 160

मैं हरि पतित-पावन सुने ।

मैं पतित तुम पतित-पावन दोउ बानक बने ॥ 1 ॥

ब्याध गनिका गज अजामिल साखि निगमनि भने ।

और अधम अनेक तारे जात कापै गने ॥ 2 ॥

जानि नाम अजानि लीन्हें नरक सुरपुर मने ।

दासतुलसी सरन आयो, राखिये आपने ॥ 3 ॥