पद 160
श्रीराम-स्तुति · पद 160 / 279
मैं हरि पतित-पावन सुने ।
मैं पतित तुम पतित-पावन दोउ बानक बने ॥ 1 ॥
ब्याध गनिका गज अजामिल साखि निगमनि भने ।
और अधम अनेक तारे जात कापै गने ॥ 2 ॥
जानि नाम अजानि लीन्हें नरक सुरपुर मने ।
दासतुलसी सरन आयो, राखिये आपने ॥ 3 ॥