पद १६१
श्रीराम-स्तुति · राग मलार · पद १६१ / २७९
तों सों प्रभु जो पै कहुँ कोउ होतो ।
तो सहि निपट निरादर निसिदिन, रटि लटि ऐसो घटि को तो ॥ १ ॥
कृपा-सुधा-जलदान माँगिबो कहाँ सो साँच निसोतो ।
स्वाति-सनेह-सलिल-सुख चाहत चित-चातक सो पोतो ॥ २ ॥
काल-करम-बस मन कुमनोरथ कबहुँ कबहुँ कुछ भो तो ।
ज्यों मुदमय बसि मीन बारि तजि उछरि भभरि लेत गोतो ॥ ३ ॥
जितो दुराव दासतुलसी उर क्यों कहि आवत ओतो ।
तेरे राज राय दसरथके , लयो बयो बिनु जोतो ॥ ४ ॥