श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 162

श्रीराम-स्तुति · रागसोरठ · पद 162 / 279

ऐसो को उदार जग माहीं ।

बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर राम सरिस कोउ नाहीं ॥ 1 ॥

जो गति जोग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनि ग्यानी ।

सो गति देत गीध सबरी कहँ प्रभु न बहुत जिय जानी ॥ 2 ॥

जो संपति दस सीस अरप करि रावन सिव पहँ लीन्हीं ।

सो संपदा बिभीषन कहँ अति सकुच-सहित हरि दीन्ही ॥ 3 ॥

तुलसिदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो ।

तौ भजु राम, काम सब पूरन करै कृपानिधि तेरो ॥ 4 ॥