श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 163

एकै दानि-सिरोमनि साँचो।

जोइ जाच्यो सोइ जाचकताबस, फिरि बहु नाच न नाचो ॥ 1 ॥

सब स्वारथी असुर सुर नर मुनि कोउ न देत बिनु पाये।

कोसलपालु कृपालु कलपतरु,द्रवत सकृत सिर नाये ॥ 2 ॥

हरिहु और अवतार आपने, राखी बेद-बड़ाई।

लै चिउरा निधि दई सुदामहिं जद्यपि बाल मिताई ॥ 3 ॥

कपि सबरी सुग्रीव बिभीषन, को नहिं कियो अजाची।

अब तुलसिहि दुख देति दयानिधि दारून आस-पिसाची ॥ 4 ॥