श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १६३

श्रीराम-स्तुति · पद १६३ / २७९

एकै दानि-सिरोमनि साँचो।

जोइ जाच्यो सोइ जाचकताबस, फिरि बहु नाच न नाचो ॥ १ ॥

सब स्वारथी असुर सुर नर मुनि कोउ न देत बिनु पाये।

कोसलपालु कृपालु कलपतरु,द्रवत सकृत सिर नाये ॥ २ ॥

हरिहु और अवतार आपने, राखी बेद-बड़ाई।

लै चिउरा निधि दई सुदामहिं जद्यपि बाल मिताई ॥ ३ ॥

कपि सबरी सुग्रीव बिभीषन, को नहिं कियो अजाची।

अब तुलसिहि दुख देति दयानिधि दारून आस-पिसाची ॥ ४ ॥