श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १६४

श्रीराम-स्तुति · पद १६४ / २७९

जानत प्रीति-रीति रघुराई।

नाते सब हाते करी राखत राम सनेह-सगाई ॥ १ ॥

नेह निबाहि देह तजि दसरथ, कीरति अचल चलाई।

ऐसेहु पितु तें अधिक गीधपर ममता गुन गरुआई ॥ २ ॥

तिय-बिरही सुग्रीव सखा लखि प्रानप्रिया बिसराई।

रन पर्यो बंधु बिभीषन ही को, सोच हृदय अधिकाई ॥ ३ ॥

घर गुरुगृह प्रिय सदन सासुरे,भइ जब जहँ पहुनाई।

तब तहँ कहि सबरीके फलनिकी रुचि माधुरी न

पाई ॥ ४ ॥

सहज सरूप कथा मुनि बरनत रहत सकुचि सिर नाई।

केवट मीत कहे सुख मानत बानर बंधु बड़ाई ॥ ५ ॥

प्रेम-कनौड़ो रामसो प्रभु त्रिभुवन तिहुँकाल न भाई।

तेरो रिनी हौं कह्यो कपि सों ऐसी मानही को सेवकाई ॥ ६ ॥

तुलसी राम-सनेह-सील लखि, जो न भगति उर आई।

तौ तोहिं जनमि जाय जननी जड़ तनु-तरुनता गवाँई ॥ ७ ॥