श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 164

जानत प्रीति-रीति रघुराई।

नाते सब हाते करी राखत राम सनेह-सगाई ॥ 1 ॥

नेह निबाहि देह तजि दसरथ, कीरति अचल चलाई।

ऐसेहु पितु तें अधिक गीधपर ममता गुन गरुआई ॥ 2 ॥

तिय-बिरही सुग्रीव सखा लखि प्रानप्रिया बिसराई।

रन पर्यो बंधु बिभीषन ही को, सोच हृदय अधिकाई ॥ 3 ॥

घर गुरुगृह प्रिय सदन सासुरे,भइ जब जहँ पहुनाई।

तब तहँ कहि सबरीके फलनिकी रुचि माधुरी न

पाई ॥ 4 ॥

सहज सरूप कथा मुनि बरनत रहत सकुचि सिर नाई।

केवट मीत कहे सुख मानत बानर बंधु बड़ाई ॥ 5 ॥

प्रेम-कनौड़ो रामसो प्रभु त्रिभुवन तिहुँकाल न भाई।

तेरो रिनी हौं कह्यो कपि सों ऐसी मानही को सेवकाई ॥ 6 ॥

तुलसी राम-सनेह-सील लखि, जो न भगति उर आई।

तौ तोहिं जनमि जाय जननी जड़ तनु-तरुनता गवाँई ॥ 7 ॥