श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 165

रघुबर! रावरि यहै बड़ाई।

निदरि गनी आदर गरीबपर ,करत कृपा अधिकाई ॥ 1 ॥

थके देव साधन करि सब, सपनेहु नहिं देत दिखाई।

केवट कुटिल भालु कपि कौनप, कियो सकल संग भाई ॥ 2 ॥

मिलि मुनिबृंद फिरत दंडक बन, सो चरचौ न चलाई।

बारहि बार गीध सबरीकी बरनत प्रीति सुहाई ॥ 3 ॥

स्वान कहे तें कियो पुर बाहिर, जती गयंद चढ़ाई।

तिय-निंदक मतिमंद प्रजा रज निज नय नगर बसाई ॥ 4 ॥

यहि दरबार दीनको आदर, रीति सदा चलि आई।

दीनदयालु दीन तुलसीकी काहु न सुरति कराई ॥ 5 ॥