श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १६६

श्रीराम-स्तुति · पद १६६ / २७९

ऐसे राम दीन-हितकारी।

अतिकोमल करुनानिधान बिनु कारन पर-उपकारी ॥ १ ॥

साधन-हीन दीन निज अघ-बस, सिला भई मुनि-नारी।

गृहतें गवनि परसि पद पावन घोर सापतें तारीं।२ ॥

हिंसारत निषाद तामस बपु, पसु-समान बनचारी।

भेंट्यो हृदय लगाइ प्रेमबस, नहिं कुल जाति बिचारी ॥ ३ ॥

जद्यपि द्रोह कियो सुरपति-सुत, कह न जाय अति भारी।

सकल लोक अवलोकि सोकहत, सरन गये भय टारी ॥ ४ ॥

बिहँग जोनि आमिष अहार पर, गीध कौन ब्रतधारी।

जनक-समान क्रिया ताकी निज कर सब भाँति सँवारी ॥ ५ ॥

अधम जाति सबरी जोषित जड़, लोक-बेद तें न्यारी।

जानि प्रीति, दै दरस कृपानिधि, सोउ रघुनात उधारी ॥ ६ ॥

कपि सुग्रीव बंधु-भय-ब्याकुल आयो सरन पुकारी।

सहि न सके दारुन दुख जनके , हत्यो बालि,सहि गारी ॥ ७ ॥

रिपुको अनुज बिभीषन निशिचर, कौन भजन अधिकारी।

सरन गये आगे ह्वे लीन्हौं भेट्यो भुजा पसारी ॥ ८ ॥

असुभ होइ जिनके सुमिरे ते बानर रीछ बिकारी।

बेद-बिदित पावन किये ते सब, महिमा नाथ! तुम्हारी ॥ ९ ॥

कहँ लगि कहौं दीन अगनित जिन्हकी तुम बिपति निवारी।

कलिमल-ग्रसित दासतुलसीपर, काहे कृपा बिसारी ? ॥ १० ॥