श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १६७

श्रीराम-स्तुति · पद १६७ / २७९

रघुपति-भगति करत कठिनाई।

कहत सुगम करनी अपार जानै सोइ जेहि बनि आई ॥ १ ॥

जो जेहि कला कुसल ताकहँ सोइ सुलभ सदा सुखकारी।

सफरी सनमुख जल-प्रवाह सुरसरी बहै गज भारी ॥ २ ॥

ज्यों सर्करा मिलै सिकता महँ, बलतें न कोउ बिलगावै।

अति रसस्य सूच्छम पिपीलिका, बिनु प्रयास ही पावै ॥ ३ ॥

सकल दृश्य निज उदर मेलि, सोवे निद्रा तजि जोगी।

सोइ हरिपद अनुभवै परम सुख, अतिसय द्वैत-बियोगी ॥ ४ ॥

सोक मोह भय हरष दिवस-निसि देस-काल तहँ नाहीं।

तुलसिदास यहि दसाहीन संसय निरमूल न जाहीं ॥ ५ ॥