श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 168

जो पै राम-चरन-रति होती।

तौ कत त्रिबिध सूल निसिबासर सहते बिपति निसोती ॥ 1 ॥

जो संतोष-सुधा निसिबासर सपनेहुँ कबहुकँ पावै।

तौ कत बिषय बिलोकि झूँठ जल मन-कुरंग ज्यों धावै ॥ 2 ॥

जो श्रीपति-महिमा बिचारि उर भजते भाव बढ़ाए।

तौ कत द्वार-द्वार कूकर ज्यों फिरते पेट खलाए ॥ 3 ॥

जे लोलुप भये दास आसके ते सबहीके चेरे।

प्रभु-बिस्वास आस जीती जिन्ह, ते सेवक हरि केरे ॥ 4 ॥

नहिं एकौ आचरन भजनको, बिनय करत हौं ताते।

कीजै कृपा दासतुलसी पर, नाथ नामके नाते ॥ 5 ॥