श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 170

यों मन कबहूँ तुमहिं न लाग्यो।

ज्यों छल छाँड़ि सुभाव निरंतर रहत बिषय अनुराग्यो ॥ 1 ॥

ज्यों चितई परनारि, सुने पातक-प्रपंच घर-घरके।

त्यों न साधु, सुरसरि-तरंग-निरमल गुनगन रघुबरके ॥ 2 ॥

ज्यों नासा सुगंधरस-बस, रसना षटरस-रति मानी।

राम-प्रसाद-माल जूठन लगि त्यों न ललकि ललचानी ॥ 3 ॥

चंदन-चंदबदनि-भूषन-पट ज्यों चह पाँवर परस्यो।

त्यों रघुपति-पद-पदुम-परस को तनु पातकी न तरस्यो ॥ 4 ॥

ज्यों सब भाँती कुदेव कुठाकुर सेये बपु बचन हिये हूँ।

त्यों न राम सुकृतग्य जे सकुचत सकृत प्रनाम किये हूँ ॥ 5 ॥

चंचल चरन लोभ लगि लोलुप द्वार-द्वार जग बागे।

राम-सीय-आस्रमनि चलत त्यों भये न स्रमित अभागे ॥ 6 ॥

सकल अंग पद-बिमुख नाथ मुख नामकी ओट लई है।

है तुलसिहिं परतीति एक प्रभु-मूरति कृपामई है ॥ 7 ॥