श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १७१

श्रीराम-स्तुति · पद १७१ / २७९

कीजै मोको जमजातनामई।

राम! तुमसे सुचि सुहृद साहिबहिं ,मैं सठ पीठि दई ॥ १ ॥

गरभबास दस मास पालि पितु-मातु-रूप हित कीन्हों।

जड़हि बिबेक,सुसील खलहिं, अपराधहिं आदर दीन्हों ॥ २ ॥

कपट करौं अंतरजामिहुँ सों, अघ ब्यापकहिं दुरावौं।

ऐसेहु कुमति कुसेवक पर रघुपति न कियो मन बावौं ॥ ३ ॥

उदर भरौं कोंकर कहाइ बेंच्यौं बिषयनि हाथ हियो है।

मोसे बंचकको कृपालु छल छाँड़ि कै छोह कियो है ॥ ४ ॥

पल-पलके उपकार रावरे जानि बूझी सुनि नीके।

भिद्यो न कुलिसहुँ ते कठोर चित कबहुँ प्रेम सिय-पीके ॥ ५ ॥

स्वामीकी सेवक-हितता सब, कछु निज साँई-द्रोहाई।

मैं मति-तुला तौलि देखी भइ मेरेहि दिसि गरूआई ॥ ६ ॥

एतेहु पर हित करत नाथ मेरो, करि आये, अरु करिहैं।

तुलसी अपनी ओर जानियत प्रभुहि कनौड़ो भरिहैं ॥ ७ ॥