श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 171

कीजै मोको जमजातनामई।

राम! तुमसे सुचि सुहृद साहिबहिं ,मैं सठ पीठि दई ॥ 1 ॥

गरभबास दस मास पालि पितु-मातु-रूप हित कीन्हों।

जड़हि बिबेक,सुसील खलहिं, अपराधहिं आदर दीन्हों ॥ 2 ॥

कपट करौं अंतरजामिहुँ सों, अघ ब्यापकहिं दुरावौं।

ऐसेहु कुमति कुसेवक पर रघुपति न कियो मन बावौं ॥ 3 ॥

उदर भरौं कोंकर कहाइ बेंच्यौं बिषयनि हाथ हियो है।

मोसे बंचकको कृपालु छल छाँड़ि कै छोह कियो है ॥ 4 ॥

पल-पलके उपकार रावरे जानि बूझी सुनि नीके।

भिद्यो न कुलिसहुँ ते कठोर चित कबहुँ प्रेम सिय-पीके ॥ 5 ॥

स्वामीकी सेवक-हितता सब, कछु निज साँई-द्रोहाई।

मैं मति-तुला तौलि देखी भइ मेरेहि दिसि गरूआई ॥ 6 ॥

एतेहु पर हित करत नाथ मेरो, करि आये, अरु करिहैं।

तुलसी अपनी ओर जानियत प्रभुहि कनौड़ो भरिहैं ॥ 7 ॥