श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 172

कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो।

श्रीरघुनाथ-कृपालु-कृपातें संत-सुभाव गहौंगो ॥ 1 ॥

जथालाभसंतोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो।

पर-हित-निरत निरंतर, मन क्रम बचन नेम निबहौंगो ॥ 2 ॥

परुष बचन अति दुसह श्रवन सुनि तेहि पावक न दहौंगो।

बिगत मान, सम शीतल मन, परगुन नहिं दोष कहौंगो ॥ 3 ॥

परहरि देह-जनित चिंता, दुख-सुख समबुद्धि सहौंगो।

तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि अबिचल हरि-भगति लहौंगो ॥ 4 ॥