श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 178

भयेहूँ उदास राम, मेरे आस रावरी।

आरत स्वारथी सब कहैं बात बावरी ॥ 1 ॥

जीवनको दानी घन कहा ताहि चाहिये।

प्रेम नेमके निबाहे चातक सराहिये ॥ 2 ॥

मीनतें न लाभ-लेस पानी पुन्य पीनको।

जल बिनु थल कहा मीचु बिनु मीनको ॥ 3 ॥

बड़े ही की ओट बलि बाँचि आये छोटे हैं।

चलत खरेके संग जहाँ-तहाँ खोटे हैं ॥ 4 ॥

यहि दरबार भलो दाहिनेहु-बामको।

मोको सुभदायक भरोसो राम-नामको ॥ 5 ॥

कहत नसानी ह्वे ह्वे हिये नाथ नीकी है।

जानत कृपानिधान तुलसीके जीकी है ॥ 6 ॥