श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १७८

श्रीराम-स्तुति · पद १७८ / २७९

भयेहूँ उदास राम, मेरे आस रावरी।

आरत स्वारथी सब कहैं बात बावरी ॥ १ ॥

जीवनको दानी घन कहा ताहि चाहिये।

प्रेम नेमके निबाहे चातक सराहिये ॥ २ ॥

मीनतें न लाभ-लेस पानी पुन्य पीनको।

जल बिनु थल कहा मीचु बिनु मीनको ॥ ३ ॥

बड़े ही की ओट बलि बाँचि आये छोटे हैं।

चलत खरेके संग जहाँ-तहाँ खोटे हैं ॥ ४ ॥

यहि दरबार भलो दाहिनेहु-बामको।

मोको सुभदायक भरोसो राम-नामको ॥ ५ ॥

कहत नसानी ह्वे ह्वे हिये नाथ नीकी है।

जानत कृपानिधान तुलसीके जीकी है ॥ ६ ॥