श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 179

श्रीराम-स्तुति · राग बिलावल · पद 179 / 279

कहाँ जाउँ, कासों कहौ, कौन सुनै दीनकी।

त्रिभुवन तुही गति सब अंगहीनकी ॥ 1 ॥

जग जगदीस घर घरनि घनेरे हैं।

निराधारके अधार गुनगन तेरे हैं ॥ 2 ॥

गजराज-काज खगराज तजि धायो को।

मोसे दोस-कोस पोसे, तोसे माय जायो को ॥ 3 ॥

मोसे कूर कायर कुपूत कौड़ी आधके।

किये बहुमोल तैं करैया गीध-श्राधके ॥ 4 ॥

तुलसीकी तेरे ही बनाये,बलि,बनैगी।

प्रभुकी बिलंब-अंब दोष-दुख जनैगी ॥ 5 ॥