श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 180

बारक बिलोकि बलि कीजै मोहिं आपनो।

राय दशरथके तू उथपन-थापनो ॥ 1 ॥

साहिब सरनपाल सबल न दूसरो।

तेरो नाम लेत ही सुखेत होत ऊसरो ॥ 2 ॥

बचन करम तेरे मेरे मन गड़े हैं।

देखे सुने जाने मैं जहान जेते बड़े हैं ॥ 3 ॥

कौन कियो समाधान सनमान सीलाको।

भृगुनाथ सो रिषी जितैया कौन लीलाको ॥ 4 ॥

मातु-पितु-बन्धु-हितु, लोक-बेदपाल को।

बोलको अचल, नत करत निहाल को ॥ 5 ॥

संग्रही सनेहबस अधम असाधुको।

गीध सबरीको कहौ करिहै सराधु को ॥ 6 ॥

निराधारको अधार, दीनको दयालु को।

मीत कपि-केवट-रजनिचर-भालु को ॥ 7 ॥

रंक,निरगुनी,नीच जितने निवाजे हैं।

महाराज! सुजन -समाज ते बिराजे हैं ॥ 8 ॥

साँची बिरुदावली न बढ़ि कहि गई है।

सीलसिंधु! ढील तुलसीकी बेर भई है ॥ 9 ॥