श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १८०

श्रीराम-स्तुति · पद १८० / २७९

बारक बिलोकि बलि कीजै मोहिं आपनो।

राय दशरथके तू उथपन-थापनो ॥ १ ॥

साहिब सरनपाल सबल न दूसरो।

तेरो नाम लेत ही सुखेत होत ऊसरो ॥ २ ॥

बचन करम तेरे मेरे मन गड़े हैं।

देखे सुने जाने मैं जहान जेते बड़े हैं ॥ ३ ॥

कौन कियो समाधान सनमान सीलाको।

भृगुनाथ सो रिषी जितैया कौन लीलाको ॥ ४ ॥

मातु-पितु-बन्धु-हितु, लोक-बेदपाल को।

बोलको अचल, नत करत निहाल को ॥ ५ ॥

संग्रही सनेहबस अधम असाधुको।

गीध सबरीको कहौ करिहै सराधु को ॥ ६ ॥

निराधारको अधार, दीनको दयालु को।

मीत कपि-केवट-रजनिचर-भालु को ॥ ७ ॥

रंक,निरगुनी,नीच जितने निवाजे हैं।

महाराज! सुजन -समाज ते बिराजे हैं ॥ ८ ॥

साँची बिरुदावली न बढ़ि कहि गई है।

सीलसिंधु! ढील तुलसीकी बेर भई है ॥ ९ ॥