श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 181

केहू भाँति कृपासिंधु मेरी ओर हेरिये।

मोको और ठौर न, सुटेक एक तेरिये ॥ 1 ॥

सहस सिलातें अति जड़ मति भई है।

कासों कहौं कौन गति पाहनिहिं दई है ॥ 2 ॥

पद-राग-जाग चहौं कौसिक ज्यों कियो हौं।

कलि-मल खल देखि भारी भीति भियो हौं ॥ 3 ॥

करम-कपीस बालि-बली, त्रास-त्रस्यो हौं।

चाहत अनाथ-नाथ! तेरी बाँह बस्यो हौं ॥ 4 ॥

महा मोह-रावन बिभीषन ज्यों हयो हौं।

त्राहि, तुलसीस! त्राहि तिहूँ ताप तयो हौं ॥ 5 ॥