पद १८१
श्रीराम-स्तुति · पद १८१ / २७९
केहू भाँति कृपासिंधु मेरी ओर हेरिये।
मोको और ठौर न, सुटेक एक तेरिये ॥ १ ॥
सहस सिलातें अति जड़ मति भई है।
कासों कहौं कौन गति पाहनिहिं दई है ॥ २ ॥
पद-राग-जाग चहौं कौसिक ज्यों कियो हौं।
कलि-मल खल देखि भारी भीति भियो हौं ॥ ३ ॥
करम-कपीस बालि-बली, त्रास-त्रस्यो हौं।
चाहत अनाथ-नाथ! तेरी बाँह बस्यो हौं ॥ ४ ॥
महा मोह-रावन बिभीषन ज्यों हयो हौं।
त्राहि, तुलसीस! त्राहि तिहूँ ताप तयो हौं ॥ ५ ॥