पद १८२
श्रीराम-स्तुति · पद १८२ / २७९
नाथ ! गुननाथ सुनि होत चित चाउ सो।
राम रीझिबेको जानौं भगति न भाउ सो ॥ १ ॥
करम,सुभाउ,काल, ठाकुर न ठाउँ सो।
सुधन न, सुतन न,सुमन, सुआउ सो ॥ २ ॥
जाँचौं जल जाहि कहै अमिय पियाउ सो।
कासों कहौं काहू सों न बढ़त हियाउ सो ॥ ३ ॥
बाप! बलि जाऊँ , आप करिये उपाउ सो।
तेरे ही निहारे परै हारेहू सुदाउ सो ॥ ४ ॥
तेरे ही सुझाये सूझै असुझ सुझाउ सो।
तेरे ही बुझाये बूझै अबुझ बुझाउ सो ॥ ५ ॥
नाम अवलंबु-अंबु दीन मीन-राउ सो।
प्रभुसों बनाइ कहौं जीह जरि जाउ सो ॥ ६ ॥
सब भाँति बिगरी है एक सुबनाउ-सो।
तुलसी सुसाहिबहिं दियो है जनाउ सो ॥ ७ ॥