श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 184

राम-नामके जपे जाइ जियकी जरनि।

कलिकाल अपर उपाय ते अपाय भये,

जैसे तम नासिबेको चित्रके तरनि ॥ 1 ॥

करम-कलाप परिताप पाप-साने सब,

ज्यों सुफूल फूले तरु फोकट फरनि।

दंभ,लोभ,लालच,उपासना बिनासि नीके ,

सुगति साधन भई उदर भरनि ॥ 2 ॥

जोग न समाधि निरुपाधि न बिराग-ग्यान,

बचन बिशेष बेष, कहूँ न करनि।

कपट कुपथ कोटि, कहनि-रहनि खोटि,

सकल सराहैं निज निज आचरनि ॥ 3 ॥

मरत महेस उपदेस हैं कहा करत,

सुरसरि-तीर कासी धरम-धरनि।

राम-नामको प्रताप हर कहैं , जपैं आप,

जुग जुग जानैं जग, बेदहूँ बरनि ॥ 4 ॥

मति राम-नाम ही सों, रति राम-नाम ही सों,

गति राम नाम ही की बिपति-हरनि।

राम-नामसों प्रतीति प्रीति राखे कबहुँक,

तुलसी ढरैंगे राम आपनी ढरनि ॥ 5 ॥