श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 185

लाज न लागत दास कहावत।

सो आचरन बिसारि सोच तजि, जो हरि तुम कहँ भावत ॥ 1 ॥

सकल संग तजि भजत जाहि मुनि, जप तप जाग बनावत।

मो-सम मंद महाखल पाँवर, कौन जतन तेहि पावत ॥ 2 ॥

हरि निरमल, मलग्रसित हृदय, असमंजस मोहि जनावत।

जेहि सर काक कंक बक सूकर, क्यों मराल तहँ आवत ॥ 3 ॥

जाकी सरन जाइ कोबिद दारुन त्रयताप बुझावत।

तहूँ गये मद मोह लोभ अति, सरगहुँ मिटत न सावत ॥ 4 ॥

भव-सरिता कहँ नाउ संत, यह कहि औरनि समुझावत।

हौं तिनसों हरि! परम बैर करि ,तुम सों भलो मनावत ॥ 5 ॥

नाहिंन और ठौर मो कहँ, ताते हठि नातो लावत।

राखु सरन उदार-चूड़ामनि! तुलसिदास गुन गावत ॥ 6 ॥