श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 186

कौन जतन बिनती करिये।

निज आचरन बिचारि हारि हिय मानि जानि डरिये ॥ 1 ॥

जेहि साधन हरि! द्रवहु जानि जन सो हठि परिहरिये।

जाते बिपति-जाल निसिदिन दुख,तेहि पथ अनसरिये ॥ 2 ॥

जानत हूँ मन बचन करम पर-हित कीन्हें तरिये।

सो बिपरीत देखि पर-सुख, बिनु कारन ही जरिये ॥ 3 ॥

श्रुति पुरान सबको मत यह सतसंग सुदृढ़ धरिये।

निज अभिमान मोह इरिषा बस तिनहिं न आदरिये ॥ 4 ॥

संतत सोइ प्रिय मोहिं सदा जातें भवनिधि परिये।

कहौं अब नाथ, कौन बलतें संसार-सोग हरिये ॥ 5 ॥

जब कब निज करुना-सुभावतें, द्रवहु तौ निस्तरिये।

तुलसिदास बिस्वास आनि नहिं, कत पचि-पचि मरिये ॥ 6 ॥