श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 193

अजहुँ आपने रामके करतब समुझत हित होइ।

कहँ तू,कहँ कोसलधनी, तोको कहा कहत सब कोइ ॥ 1 ॥

रीझि निवाज्यो कबहिं तू, कब खीझि दई तोहिं गारि।

दरपन बदन निहारिकै , सुबिचारि मान हिय हारि ॥ 2 ॥

बिगरी जनम अनेककी सुधरत पल लगै न आधु।

’पाहि कृपानिधि’ प्रेमसों कहे को न राम कियो साधु ॥ 3 ॥

बालमीकि-केवट-कथा, कपि-भील-भालु-सनमान।

सुनि सनमुख जो न रामसों, तिहि को उपदेसहि ग्यान ॥ 4 ॥

का सेवा सुग्रीवकी, का प्रीति-रीति-निरबाहु।

जासु बंधु बध्यो ब्याध ज्यों, सो सुनत सोहात न काहु ॥ 5 ॥

भजन बिभीषनको कहा, फल कहा दियो रघुराज।

राम गरीब-निवाजके बड़ी बाँह-बोलकी लाज ॥ 6 ॥

जपहि नाम रघुनाथको, चरचा दूसरी न चालु।

सुमुख,सुखद,साहिब,सुधी,समरथ,कृपालु,नतपालु ॥ 7 ॥

सजल नयन,गदगदगिरा, गहबर मन,पुलक सरीर।

गावत गुनगन रामके केहिकी न मिटी भव-भीर ॥ 8 ॥

प्रभु कृतग्य सरबस्य हैं ,परिहरु पाछिली गलानि।

तुलसी तोसों रामसों कछु नई न जान-पहिचानि ॥ 9 ॥