श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १९४

श्रीराम-स्तुति · पद १९४ / २७९

जो अनुराग न राम सनेही सों।

तौ लह्यो लाहु कहा नर-देही सों ॥ १ ॥

जो तनु धरि, परिहरि सब सुख, भये सुमति राम-अनुरागी।

सो तनु पाइ अघाइ किये अघ, अवगुन-उदधि अभागी ॥ २ ॥

ग्यान-बिराग,जोग-जप,तप-मख,जग मुद-मग नहिं थोरे।

राम-प्रेम बिनु नेम जाय जैसे मृग-जल-जलधि-हिलोरे ॥ ३ ॥

लोक-बिलोकि, पुरान-बेदि सुनि, समुझि-बूझि गुरु-ग्यानी।

प्रीति-प्रतीति राम-पद-पंकज सकल-सुमंगल-खानी ॥ ४ ॥

अजहुँ जानि जिय, मानि हारि हिय, होइ पलक महँ नीको।

सुमिरु सनेहसहित हित रामहिं, मानु मतो तुलसीको ॥ ५ ॥