श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १९६

श्रीराम-स्तुति · पद १९६ / २७९

काहेको फिरत मन, करत बहु जतन,

मिटै न दुख बिमुख रघुकुल-बीर।

कीजै जो कोटि उपाइ,त्रिबिध ताप न जाइ,

कह्यो जो भुज उठाय मुनिबर कीर ॥ १ ॥

सहज टेव बिसारि तुही धौं देखु बिचारि,

मिलै न मथत बारि घृत बिनु छीर।

समुझि तजहि भ्रम, भजहि पद-जुगम,

सेवत सुगम, गुन गहन गंभीर ॥ २ ॥

आगम निगम ग्रंथ, रिषि-मुनि, सुर-संत,

सब ही को एक मत सुनु, मतिधीर।

तुलसिदास प्रभु बिनु पियास मरै पसु,

जद्यपि है निकट सुरसरि-तीर ॥ ३ ॥