श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १९७

श्रीराम-स्तुति · पद १९७ / २७९

नाहिन चरन-रति ताहि तें सहौं बिपति,

कहत श्रुति सकल मुनि मतिधीर।

बसै जो ससि-उछंग सुधा-स्वादित कुरंग,

ताहि क्यों भ्रम निरखि रबिकर-नीर ॥ १ ॥

सुनिय नाना पुरान, मिटत नाहिं अग्यान,

पढ़िय न समुझिय जिमि खग कीर।

बँधत बिनहिं पास सेमर-सुमन-आस,

करत चरत तेइ फल बिनु हीर ॥ २ ॥

कछु न साधन-सिधि, जानौं न निगम-बिधि,

नहिं जप-तप, बस मन, न समीर।

तुलसिदास भरोस परम करुना-कोस,

प्रभु हरिहैं बिषम भवभीर ॥ ३ ॥