श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १९९

श्रीराम-स्तुति · पद १९९ / २७९

काहे को फिरत मूढ़ मन धायो।

तजि हरि-चरन-सरोज सुधारस, रबिकर-जल लय लायो ॥ १ ॥

त्रिजग देव नर असुर अपर जग जोनि सकल भ्रमि आयो।

गृह बनिता, सुत, बंधु भये बहु, मातु-पिता जिन्ह जायो ॥ २ ॥

जाते निरय-निकाय निरंतर, सोइ इन्ह तोहि सिखायो।

तुव हित होइ, कटै भव-बंधन, सो मगु तोहि न बतायो ॥ ३ ॥

अजहुँ बिषय कहँ जतन करत, जद्यपि बहुबिधि डहँकायो।

पावक-काम भोग-घृत तें सठ, कैसे परत बुझायौ ॥ ४ ॥

बिषयहीन दुख, मिले बिपति अति, सुख सपनेहुँ नहिं पायो।

उभय प्रकार प्रेत-पावक ज्यों धन दुखप्रद श्रुति गायो ॥ ५ ॥

छिन-छिन छीन होत जीवन, दुरलभ तनु बृथा गँवायो।

तुलसिदास हरि भजहि आस तजि, काल -उरग जग खायो ॥ ६ ॥