श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 200

ताँबे सो पीठि मनहुँ तन पायो।

नीच,मीच जानत न सीस पर, ईस निपट बिसरायो ॥ 1 ॥

अवनि रवनि, धन-धाम, सुहृद-सुत, को न इन्हहिं अपनायो ?

काके भये, गये सँग काके , सब सनेह छल-छायो ॥ 2 ॥

जिन्ह भूपनि जग-जीति, बाँधि जम, अपनी बाँह बसायो।

तेऊ काल कलेऊ कीन्हे, तू गिनती कब आयो ॥ 3 ॥

देखु बिचारि, सार का साँचो,कहा निगम निजु गायो।

भजिहिं न अजहुँ समुझि तुलसी तेहि,जेहि महेस मन लायो ॥ 4 ॥